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दुनिया ने माना 'नए भारत' का लोहा: पावर इंडेक्स में लगाई लंबी छलांग, अब एशिया की तीसरी सबसे बड़ी महाशक्ति!

दुनिया ने माना 'नए भारत' का लोहा: पावर इंडेक्स में लगाई लंबी छलांग, अब एशिया की तीसरी सबसे बड़ी महाशक्ति!

दुनिया ने माना 'नए भारत' का लोहा: पावर इंडेक्स में लगाई लंबी छलांग, अब एशिया की तीसरी सबसे बड़ी महाशक्ति!

परिचय: हवा का रुख बदल रहा है

क्या आपने भी महसूस किया है? पिछले कुछ सालों में, जब भी दुनिया के मंच पर भारत की बात होती है, तो लहजा बदला हुआ सा लगता है। चाहे वो G20 का सफल आयोजन हो, चंद्रयान की ऐतिहासिक लैंडिंग हो, या फिर दुनिया भर में मंदी की आहट के बीच भारत की इकोनॉमी का मजबूती से खड़े रहना। हवा का रुख साफ तौर पर बदल रहा है।

हम अक्सर खबरों में सुनते हैं कि "भारत का डंका बज रहा है", लेकिन कई बार यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा लगता है। पर जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, जो आंकड़ों और तथ्यों पर बात करती हैं, इस बात पर मुहर लगाती हैं, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

हाल ही में एक ऐसी ही बड़ी खबर आई है जिसने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है। प्रतिष्ठित 'लोवी इंस्टीट्यूट' (Lowy Institute) द्वारा जारी 'एशिया पावर इंडेक्स 2024' में भारत ने एक लंबी छलांग लगाई है। भारत अब जापान और यहां तक कि अपने पुराने और शक्तिशाली मित्र रूस को पछाड़कर एशिया का तीसरा सबसे शक्तिशाली देश बन गया है।

यह सिर्फ एक रैंकिंग का बदलना नहीं है; यह दशकों की मेहनत, सही नीतियों और 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम है। लेकिन एक आम भारतीय के लिए इसका क्या मतलब है? यह बदलाव कैसे आया? और क्या अब हम संतुष्ट होकर बैठ जाएं?

आज के इस ब्लॉग में, हम इसी "पावर शिफ्ट" की गहराई में जाएंगे। बिना किसी भारी-भरकम कूटनीतिक भाषा के, एकदम सरल और सीधी बात करेंगे कि आखिर भारत ने यह मुकाम कैसे हासिल किया।

आखिर क्या है यह 'पावर इंडेक्स' और इसकी अहमियत?

इससे पहले कि हम जश्न मनाएं, जरा यह समझ लेते हैं कि यह 'पावर इंडेक्स' आखिर किस चिड़िया का नाम है।

सरल भाषा में कहें तो, लोवी इंस्टीट्यूट का यह इंडेक्स एशिया-प्रशांत क्षेत्र में देशों की ताकत को मापता है। लेकिन 'ताकत' का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि किसके पास कितनी बड़ी सेना या कितने परमाणु बम हैं। यह इंडेक्स ताकत को दो मुख्य हिस्सों में बांटकर देखता है:

  1. संसाधन (Resources): आपके पास क्या है? (आपकी इकोनॉमी का आकार, सैन्य क्षमता, जनसंख्या, भविष्य के संसाधन)।
  2. प्रभाव (Influence): आप अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके दुनिया को कितना प्रभावित कर सकते हैं? (आपके कूटनीतिक संबंध, सांस्कृतिक प्रभाव, आर्थिक रिश्ते)।

यह वैसा ही है जैसे किसी मोहल्ले में कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए ताकतवर नहीं होता कि उसके पास बहुत पैसा है, बल्कि इसलिए भी कि लोग उसकी बात सुनते हैं, विवादों में उसकी राय मायने रखती है, और उसके संबंध सबसे अच्छे हैं। भारत ने इन्हीं दोनों मोर्चों पर अपनी स्थिति मजबूत की है।

रूस को पछाड़ना: एक नए युग का संकेत

इस साल की रिपोर्ट की सबसे बड़ी हेडलाइन यही है कि भारत ने रूस को पीछे छोड़ दिया है। यह एक बहुत बड़ा प्रतीकात्मक बदलाव है।

दशकों तक, शीत युद्ध के जमाने से, हम रूस (तब सोवियत संघ) को एक ऐसी महाशक्ति के रूप में देखते आए हैं जिसके सामने भारत बहुत छोटा नजर आता था। रूस हमारा सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में भू-राजनीति का पहिया तेजी से घूमा है।

यूक्रेन युद्ध में फंसने के बाद रूस की वैश्विक छवि और प्रभाव को गहरा धक्का लगा है। उसकी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से जूझ रही है और उसका पूरा ध्यान यूरोप में चल रही जंग पर केंद्रित हो गया है। इसका सीधा असर एशिया में उसके प्रभाव पर पड़ा है।

वहीं दूसरी ओर, भारत एक 'उभरती हुई शक्ति' से 'स्थापित शक्ति' बनने की राह पर है। यह रैंकिंग रूस के कमजोर होने से ज्यादा, भारत के मजबूत होने की कहानी बयां करती है। यह दर्शाता है कि एशिया में शक्ति का संतुलन अब बदल रहा है और दुनिया अब भारत को अमेरिका और चीन के बाद सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में देख रही है।

भारत की इस छलांग के पीछे के 'गेम-चेंजर्स'

आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत का स्कोर बढ़ा और रैंकिंग सुधर गई? इसके पीछे कोई एक जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि कई मोर्चों पर किया गया लगातार काम है।

1. अर्थव्यवस्था का इंजन (The Economic Engine)

दुनिया मान रही है कि भारत वैश्विक विकास का नया इंजन है। कोविड महामारी के झटकों से जिस तेजी से भारतीय अर्थव्यवस्था उबरी है, उसने सबको हैरान किया है। आज हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और जल्द ही तीसरी बनने की राह पर हैं। हमारा विशाल बाजार, बढ़ता मध्यम वर्ग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI जैसी क्रांतियां) दुनिया भर के निवेशकों को अपनी ओर खींच रहा है। जब जेब में पैसा होता है, तो दुनिया आपकी बात ध्यान से सुनती है।

2. 'विश्वगुरु' वाली कूटनीति और संतुलन की कला

भारत की विदेश नीति पिछले कुछ सालों में बेहद परिपक्व और आत्मविश्वास से भरी हुई नजर आई है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर जिस बेबाकी से वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष रखते हैं, उसने भारत की छवि को 'रक्षात्मक' से 'सक्रिय' बना दिया है.

भारत ने अद्भुत संतुलन साधा है। एक तरफ हमारे अमेरिका के साथ रिश्ते ऐतिहासिक ऊंचाई पर हैं (चाहे वो टेक्नोलॉजी हो या रक्षा सौदे), वहीं दूसरी तरफ हमने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा, और साथ ही यूक्रेन युद्ध पर अपनी स्वतंत्र राय भी रखी। हम 'क्वाड' (Quad) में भी हैं और 'ब्रिक्स' (BRICS) में भी। दुनिया के बंटे हुए माहौल में, भारत एक ऐसा देश बनकर उभरा है जो 'सबका दोस्त' है और जिससे हर कोई बात करना चाहता है। इसे इंडेक्स में 'डिप्लोमेटिक इन्फ्लुएंस' (कूटनीतिक प्रभाव) कहा जाता है, जिसमें भारत का स्कोर काफी अच्छा रहा है।

3. भविष्य के संसाधन (Future Resources)

इस इंडेक्स में भारत की एक बहुत बड़ी ताकत उसके 'भविष्य के संसाधन' हैं। इसका मतलब है हमारी युवा आबादी। जहाँ चीन, जापान और रूस जैसे देश बूढ़ी होती आबादी और घटते वर्कफोर्स से जूझ रहे हैं, वहीं भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा कार्यबल है। यह 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' (जनसांख्यिकीय लाभांश) आने वाले दशकों में हमारी ग्रोथ का सबसे बड़ा आधार बनेगा।

यथार्थवादी चश्मा: अभी 'दिल्ली दूर है' (The Reality Check)

जश्न मनाना जरूरी है, क्योंकि यह हमारी मेहनत का फल है। लेकिन, एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते, हमें यथार्थवादी चश्मा भी पहने रहना चाहिए। अगर हम सिर्फ तारीफों के पुल बांधेंगे तो हम आत्ममुग्धता (Complacency) का शिकार हो सकते हैं।

रिपोर्ट के आंकड़ों को गहराई से देखें तो कुछ चिंताजनक बातें भी सामने आती हैं:

  • महाशक्तियों से बहुत बड़ी दूरी: हां, हम तीसरे नंबर पर हैं। लेकिन पहले नंबर पर अमेरिका और दूसरे पर चीन का स्कोर हमसे बहुत ज्यादा है। वे 'सुपरपावर' की श्रेणी में हैं। चीन की आर्थिक और सैन्य क्षमता अभी भी भारत से कई गुना ज्यादा है। उस खाई को पाटने में हमें अभी दशकों लगेंगे।
  • आर्थिक रिश्ते: रिपोर्ट बताती है कि हालांकि हमारा कूटनीतिक प्रभाव बढ़ा है, लेकिन एशिया के बाकी देशों के साथ हमारे 'आर्थिक संबंध' (Economic Relationships) अभी भी उम्मीद से कम हैं। इस मामले में चीन का दबदबा बहुत ज्यादा है। हमें अपने पड़ोसियों और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाना होगा।
  • प्रति व्यक्ति आय की चुनौती: देश की जीडीपी बड़ी हो सकती है, और हम पावर इंडेक्स में ऊपर जा सकते हैं, लेकिन एक आम भारतीय की जिंदगी में असली बदलाव तब आएगा जब 'प्रति व्यक्ति आय' बढ़ेगी। इस मोर्चे पर हम अभी भी दुनिया में काफी नीचे हैं। गरीबी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी चुनौतियों से निपटे बिना महाशक्ति बनने का सपना अधूरा रहेगा।

निष्कर्ष: यह मंजिल नहीं, एक पड़ाव है

तो, अंत में हम इस खबर को कैसे देखें?

लोवी इंस्टीट्यूट के पावर इंडेक्स में भारत का उदय निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक क्षण है। यह उस नए भारत का प्रतिबिंब है जो अपनी शर्तों पर दुनिया से जुड़ रहा है, जो अपनी क्षमताओं को पहचानता है और जो अब किसी का पिछलग्गू बनने को तैयार नहीं है।

यह रैंकिंग हमारे वैज्ञानिकों, हमारे उद्यमियों, हमारे सैनिकों और हमारे नेतृत्व की सामूहिक सफलता का प्रमाण है। रूस को पछाड़ना एक मनोवैज्ञानिक बाधा को पार करने जैसा है।

लेकिन, इसे अंतिम मंजिल मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। यह सिर्फ एक पड़ाव है। तीसरा स्थान हासिल करना कठिन था, लेकिन इसे बनाए रखना और यहां से नंबर दो या नंबर एक की तरफ बढ़ना कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा।

दुनिया अब भारत को एक गंभीर खिलाड़ी के रूप में देख रही है। इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। अब हमें अपनी आर्थिक गति को बनाए रखना होगा, अपनी आंतरिक चुनौतियों को सुलझाना होगा और अपनी युवा आबादी के कौशल विकास पर ध्यान देना होगा।

यह समय गर्व करने का है, लेकिन साथ ही अपनी कमर कसने का भी है। क्योंकि असली खेल तो अब शुरू हुआ है।

*(यह ब्लॉग पोस्ट केवल सूचना और विश्लेषण के उद्देश्य से लिखा गया है। यह लेखक के व्यक्तिगत विचारों और उपलब्ध रिपोर्ट्स के विश्लेषण पर आधारित है।)*

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