भारत की इकोनॉमी का 'हाथी' अब दौड़ने लगा है, या यह सिर्फ एक छोटी सी अंगड़ाई है? | GDP Growth
भारत की इकोनॉमी का 'हाथी' अब दौड़ने लगा है, या यह सिर्फ एक छोटी सी अंगड़ाई है? (India's GDP Growth: The Real Story)
परिचय: हवा में बदलाव की आहट
क्या आपने भी महसूस किया है? जब आप अपने शहर के बाहरी इलाके में जाते हैं और वहां नए बनते फ्लाईओवर देखते हैं, या जब आप देखते हैं कि गांव की छोटी सी किराना दुकान पर भी कोई QR कोड स्कैन करके पेमेंट कर रहा है। हवा में एक बदलाव की आहट है। एक ऐसी ऊर्जा जो कह रही है कि भारत अब रुकने वाला नहीं है।
पिछले कुछ सालों में, खासकर कोरोना महामारी के बाद से, भारत की अर्थव्यवस्था (Economy) जिस तरह से उभरी है, वह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक तरफ पूरी दुनिया मंदी (Recession) के डर से कांप रही है, यूरोप संघर्ष कर रहा है, चीन अपनी ही समस्याओं में उलझा है, और अमेरिका महंगाई से लड़ रहा है। और इन सबके बीच, भारत एक 'ब्राइट स्पॉट' (Bright Spot) की तरह चमक रहा है।
जब खबर आती है कि "भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है" और हमने ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया है, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह 200 साल के इतिहास का एक जवाब है। लेकिन, एक आम आदमी के तौर पर, मेरे और आपके मन में एक सवाल जरूर उठता है—क्या ये बड़े-बड़े जीडीपी के आंकड़े मेरी जेब पर भी असर डाल रहे हैं?
आज हम इसी पर खुलकर बात करेंगे। बिना किसी भारी-भरकम इकोनॉमिक्स की भाषा के, एकदम सरल और सीधी बात। आइए समझते हैं भारत की जीडीपी ग्रोथ की असल कहानी—उसकी चमक और उसके पीछे की चुनौतियां दोनों।
जीडीपी (GDP) आखिर है क्या बला? (एक देसी समझ)
इससे पहले कि हम आंकड़ों में कूदें, जरा यह समझ लेते हैं कि यह जीडीपी है क्या, जिसके बारे में टीवी एंकर चिल्लाते रहते हैं।
सरल भाषा में कहें तो, एक साल के अंदर हमारे देश की सीमा में जितनी भी चीजें बनीं (चाहे वो सुई हो या हवाई जहाज) और जितनी भी सेवाएं दी गईं (चाहे वो डॉक्टर की फीस हो या नाई की हजामत), उन सबकी कुल कीमत को जीडीपी (Gross Domestic Product) कहते हैं।
अगर जीडीपी बढ़ रही है, मतलब देश में काम-धंधा बढ़ रहा है, लोग चीजें खरीद रहे हैं और कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं।
भारत की रफ्तार: दुनिया क्यों हैरान है?
अभी हाल ही के आंकड़े देखें, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7% से 8% के बीच झूल रही है (तिमाही दर तिमाही थोड़ा ऊपर-नीचे होता रहता है)। दुनिया के बड़े देशों के लिए 2-3% की ग्रोथ लाना भी मुश्किल हो रहा है, ऐसे में भारत का यह प्रदर्शन वाकई शानदार है।
आखिर यह हो कैसे रहा है? इसके पीछे कुछ बड़े कारण हैं, जो हमें समझना जरूरी है:
1. सरकार का 'कैपेक्स' (Capex) का जोर (यानी बुनियादी ढांचे पर खर्च)
आपने गौर किया होगा कि पिछले कुछ सालों में हाईवे, एक्सप्रेसवे, नए रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट्स बनने की रफ्तार कितनी तेज हुई है। सरकार अपनी तिजोरी खोलकर इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसा बहा रही है।
जब एक सड़क बनती है, तो सिर्फ सड़क नहीं बनती। उसके लिए सीमेंट चाहिए, सरिया चाहिए, मशीनें चाहिए और हजारों मजदूरों को काम मिलता है। यह पैसा जब बाजार में घूमता है, तो इकोनॉमी का पहिया तेज चलता है। सरकार का यह 'कैपेक्स पुश' अभी हमारी ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन है।
2. हम भारतीय और हमारी खर्च करने की आदत (Domestic Consumption)
हम 140 करोड़ लोग हैं। और हमें चीजें चाहिए। हमें नए कपड़े चाहिए, त्योहारों पर मिठाइयां चाहिए, और अब तो प्रीमियम चीजें भी चाहिए। भारत की इकोनॉमी की सबसे बड़ी ताकत हम खुद हैं। हमारी घरेलू मांग इतनी ज्यादा है कि अगर दुनिया में थोड़ी मंदी आ भी जाए, तो हम अपने दम पर अपनी इकोनॉमी को बचा ले जाते हैं। लोग अब खर्च करने से डर नहीं रहे हैं, जो बाजार के लिए अच्छी खबर है।
3. 'मेक इन इंडिया' का धीरे-धीरे रंग लाना
सालों तक "मेक इन इंडिया" सिर्फ एक नारा लगता था। लेकिन अब ज़मीन पर कुछ बदलाव दिख रहे हैं। खासकर पीएलआई (PLI) स्कीम के बाद। एपल (Apple) जैसी कंपनियां अब भारत में आईफोन बना रही हैं। यह एक शुरुआत है। अगर हम दुनिया की फैक्ट्री बनने में चीन का थोड़ा सा भी हिस्सा छीन पाए, तो यह हमारी जीडीपी के लिए गेम-चेंजर होगा।
4. डिजिटल इंडिया का चमत्कार (UPI की क्रांति)
यह शायद पिछले एक दशक की सबसे बड़ी सफलता है। जिस देश में लोगों के पास बैंक खाते नहीं थे, आज वहां का सब्जी वाला भी ऑनलाइन पेमेंट ले रहा है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर ने बिजनेस करना बहुत आसान और तेज बना दिया है। इसने इकोनॉमी में एक ऐसी जान फूंक दी है, जिसका असर हमें लंबे समय तक दिखेगा।
तो क्या सब कुछ 'चंगा सी'? (दिक्कतें और चुनौतियां)
अगर आप सिर्फ ऊपर की बातें सुनेंगे, तो लगेगा कि भारत में तो रामराज्य आ गया है इकोनॉमी का। लेकिन, एक जागरूक नागरिक होने के नाते, हमें सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना चाहिए। जो चमक रहा है, उसके पीछे कुछ अंधेरे कोने भी हैं।
यही वो हिस्सा है जो एक मशीन द्वारा लिखा गया लेख शायद छोड़ दे, लेकिन हम इंसान इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।
1. 'के-शेप्ड' (K-Shaped) रिकवरी का दर्द: अमीर और अमीर, गरीब वहीं का वहीं
यह भारत की ग्रोथ स्टोरी का सबसे कड़वा सच है। हमारी ग्रोथ 'K' अक्षर की तरह हो रही है। 'K' की ऊपर वाली डंडी की तरह अमीरों की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है। महंगी एसयूवी कारों (SUVs) की बिक्री रिकॉर्ड तोड़ रही है, पांच सितारा होटल भरे हुए हैं और शेयर बाजार में लोग पैसा छाप रहे हैं।
लेकिन 'K' की नीचे वाली डंडी का क्या? यह वो बड़ा तबका है जो अब भी संघर्ष कर रहा है। ग्रामीण भारत में अभी भी मांग कमजोर है। वहां लोग अब भी सोच-समझकर बुनियादी चीजें खरीद रहे हैं। जब तक यह खाई नहीं भरेगी, हमारी ग्रोथ टिकाऊ नहीं होगी।
2. ग्रोथ तो है, पर नौकरियां कहां हैं? (Jobless Growth)
यह वह सवाल है जो हर युवा के मन में है। जीडीपी के आंकड़े शानदार हैं, लेकिन क्या उसी अनुपात में अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा हो रही हैं? जवाब है- शायद नहीं।
आज भी हमारा पढ़ा-लिखा युवा छोटी-मोटी नौकरियों के लिए तरस रहा है। हमारी ग्रोथ अभी भी ज्यादातर मशीनों और पूंजी पर आधारित है, न कि श्रम (Labour) पर। हमें ऐसी मैन्युफैक्चरिंग की जरूरत है जो करोड़ों लोगों को काम दे सके। सिर्फ जीडीपी बढ़ना काफी नहीं है, 'रोजगार वाली जीडीपी' बढ़ना जरूरी है।
3. महंगाई का जिन्न और मानसून का जुआ
भले ही हेडलाइन महंगाई थोड़ी काबू में दिखती हो, लेकिन आम आदमी की थाली महंगी हुई है। खाने-पीने की चीजों के दाम, खासकर सब्जियों और दालों के दाम, जब बढ़ते हैं तो गरीब आदमी का बजट बिगड़ जाता है।
और हम यह न भूलें कि आज भी हमारी इकोनॉमी का एक बड़ा हिस्सा मानसून के भरोसे है। एक खराब बारिश, और ग्रामीण इलाकों की डिमांड ठप पड़ जाती है। हमें इस निर्भरता को कम करना होगा।
निष्कर्ष: रास्ता सही है, पर सफर लंबा है
तो, अंत में हम क्या समझें? क्या हमें जश्न मनाना चाहिए या चिंता करनी चाहिए?
मेरा मानना है कि हमें 'सतर्क आशावाद' (Cautious Optimism) रखना चाहिए। भारत की इकोनॉमी उस हाथी की तरह है जो अब खड़ा हो चुका है और चलने लगा है। दिशा बिल्कुल सही है। दुनिया हमारी तरफ उम्मीद से देख रही है। हमारे पास सबसे युवा आबादी है, जो हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन, हमें आत्ममुग्धता (Complacency) से बचना होगा। 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का सपना तभी सच होगा जब हम अपनी बुनियादी समस्याओं—शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार—को ठीक करेंगे।
जीडीपी के आंकड़े हमें बताते हैं कि हम कितना कमा रहे हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि वह कमाई कितनों में बंट रही है। असली सफलता तब होगी जब जीडीपी की यह दौड़ अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक भी पहुंचेगी।
फिलहाल, इतना तय है कि भारत का समय आ गया है। यह दशक हमारा हो सकता है, बस हमें अपने कदम लड़खड़ाने नहीं देने हैं।
*(यह ब्लॉग पोस्ट केवल सूचना और विश्लेषण के उद्देश्य से लिखा गया है। यह कोई वित्तीय सलाह नहीं है।)*

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