पुतिन का भारत दौरा: 2025 में क्या होगा एजेंडा? व्यापार, रक्षा और चीन पर महामंथन (विस्तृत विश्लेषण)
पुतिन के भारत दौरे की सुगबुगाहट: 2025 में क्या हो सकता है एजेंडा? एक विस्तृत विश्लेषण
परिचय: बदलती दुनिया में एक पुरानी दोस्ती की नई परीक्षा
वैश्विक भू-राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक अहम चर्चा जोर पकड़ रही है—रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का संभावित भारत दौरा। यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद से राष्ट्रपति पुतिन की विदेश यात्राएं बेहद सीमित रही हैं। ऐसे में, अगर 2025 में वह भारत आते हैं, तो यह केवल एक द्विपक्षीय बैठक नहीं होगी, बल्कि इसके गहरे वैश्विक मायने होंगे।
2025 का साल 2022 या 2023 से अलग है। दुनिया अब यूक्रेन युद्ध के दीर्घकालिक प्रभावों, पश्चिमी प्रतिबंधों की नई वास्तविकता और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच तालमेल बिठाना सीख रही है। भारत के लिए, रूस एक 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदार' बना हुआ है, लेकिन नई दिल्ली अब अपनी 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) पर भी उतना ही जोर दे रहा है।
अगर यह बहुप्रतीक्षित दौरा होता है, तो दोनों नेताओं (प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन) की टेबल पर क्या-क्या मुद्दे होंगे? आइए, 2025 के चश्मे से इस संभावित एजेंडे का विस्तृत विश्लेषण करते हैं।
2025 में पुतिन-मोदी शिखर सम्मेलन के प्रमुख संभावित एजेंडे
यह दौरा सिर्फ रस्मी नहीं होगा। दोनों देशों के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां और अवसर हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
1. व्यापार असंतुलन और भुगतान तंत्र (Trade Imbalance & Payment Mechanism)
यह शायद सबसे पेचीदा और जरूरी मुद्दा होगा।
- वर्तमान स्थिति (2025 तक): यूक्रेन युद्ध के बाद भारत रूस से कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है। इससे द्विपक्षीय व्यापार ऐतिहासिक ऊंचाई (50-60 बिलियन डॉलर से अधिक) पर पहुंच गया है।
- समस्या: यह व्यापार पूरी तरह एकतरफा है। भारत रूस से बहुत कुछ खरीद रहा है, लेकिन रूस भारत से बहुत कम खरीद रहा है। इसके कारण रूस के पास भारतीय रुपयों का भारी भंडार जमा हो गया है, जिसका वे आसानी से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।
- एजेंडा:
- रुपया-रूबल तंत्र: पश्चिमी प्रतिबंधों (SWIFT से बाहर होना) से बचने के लिए एक स्थिर और विश्वसनीय भुगतान प्रणाली को अंतिम रूप देना।
- असंतुलन ठीक करना: पुतिन भारत से आयात बढ़ाने के ठोस प्रस्ताव ला सकते हैं। भारत चाहेगा कि रूस अपनी दवाइयों, मशीनरी, ऑटो कंपोनेंट्स और कृषि उत्पादों की जरूरतों के लिए भारतीय बाजार की ओर देखे ताकि व्यापार घाटा कम हो सके।
2. रक्षा सहयोग: 'खरीदार-विक्रेता' से 'संयुक्त उत्पादन' की ओर
रक्षा संबंध हमेशा से भारत-रूस रिश्तों की रीढ़ रहे हैं, लेकिन अब इसका स्वरूप बदल रहा है।
- आपूर्ति की चिंताएं: यूक्रेन युद्ध के कारण रूस खुद हथियारों की कमी से जूझ रहा है। भारत को चिंता है कि S-400 मिसाइल सिस्टम की बाकी रेजिमेंट्स की डिलीवरी और मौजूदा रूसी उपकरणों (जैसे सुखोई जेट्स) के स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में देरी न हो। पुतिन को इस पर भरोसा दिलाना होगा।
- 'मेक इन इंडिया' पर जोर: 2025 तक, भारत रक्षा आयात कम करने पर और जोर देगा। एजेंडा सिर्फ हथियार खरीदना नहीं, बल्कि भारत में उनका संयुक्त उत्पादन (Joint Production) होगा। AK-203 राइफलों के निर्माण में तेजी और भविष्य के सैन्य प्लेटफार्मों के लिए तकनीक हस्तांतरण (ToT) पर गंभीर चर्चा हो सकती है।
3. भू-राजनीति और चीन का कोण (The China Factor)
यह वह मुद्दा है जिस पर सार्वजनिक रूप से कम, लेकिन बंद कमरे में सबसे ज्यादा गंभीर बात होगी।
- रूस-चीन निकटता: पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस चीन के बहुत करीब आ गया है। भारत के लिए, जिसका चीन के साथ सीमा विवाद चल रहा है, यह एक बड़ी रणनीतिक चिंता है। प्रधानमंत्री मोदी यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि मॉस्को और बीजिंग की बढ़ती दोस्ती, नई दिल्ली के हितों के खिलाफ न जाए।
- यूक्रेन युद्ध का भविष्य: 2025 तक युद्ध किस मोड़ पर होगा? भारत हमेशा से कूटनीति और बातचीत का पक्षधर रहा है। मोदी एक बार फिर शांति के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने पर चर्चा कर सकते हैं।
4. ऊर्जा सुरक्षा और कनेक्टिविटी (Energy & Connectivity)
- कच्चा तेल और गैस: भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से सस्ते तेल की आपूर्ति जारी रखना चाहेगा। 2025 में लंबी अवधि के तेल अनुबंधों पर बात हो सकती है।
- परमाणु ऊर्जा: कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र की आगामी इकाइयों और भारत में नए स्थानों पर रूसी तकनीक से बनने वाले रिएक्टर्स पर प्रगति की समीक्षा होगी।
- INSTC और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर: यूरोप जाने वाले रास्ते बाधित होने के कारण, रूस के लिए 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) जीवनरेखा बन गया है। भारत भी मध्य एशिया तक अपनी पहुंच के लिए इसे महत्वपूर्ण मानता है। इस कॉरिडोर को पूरी तरह सक्रिय करने और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग (जो कोकिंग कोल के लिए अहम है) पर ठोस प्रगति एजेंडे में होगी।
5. अंतरिक्ष और विज्ञान सहयोग
- भारत के 'गगनयान' मिशन (मानव अंतरिक्ष उड़ान) में रूस का सहयोग और भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशनों या चंद्र मिशनों में साझेदारी पर बात हो सकती है।
राह आसान नहीं है: इस दौरे के एजेंडे पर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की कड़ी नजर होगी। भारत पर रूस से दूरी बनाने का दबाव 2025 में भी बना रहेगा। इसके अलावा, भुगतान के मुद्दों को सुलझाना तकनीकी रूप से बहुत जटिल है।
निष्कर्ष: 2025 में पुतिन का भारत दौरा, अगर होता है, तो यह साबित करेगा कि तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद भारत-रूस संबंध मजबूत बने हुए हैं। यह दौरा पुरानी दोस्ती की यादें ताज़ा करने के लिए नहीं, बल्कि एक नई, कठिन और प्रतिबंधों से घिरी दुनिया में इस रिश्ते को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए 'री-कैलिब्रेशन' (पुनर्गठन) का एक प्रयास होगा।
भारत के लिए यह दौरा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन होगा—यह दिखाते हुए कि वह पश्चिम के साथ अपने बढ़ते संबंधों और रूस के साथ अपनी समय-परखी दोस्ती के बीच संतुलन साधने में सक्षम है।

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