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RELOS समझौता: क्या है भारत-रूस सैन्य लॉजिस्टिक्स पैक्ट और यह क्यों महत्वपूर्ण है? (विस्तृत विश्लेषण)

भारत-रूस RELOS समझौता: एक विस्तृत विश्लेषण

RELOS समझौता: क्या है भारत-रूस सैन्य लॉजिस्टिक्स पैक्ट और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

DyGrow रक्षा विश्लेषण | भू-राजनीति (Geopolitics)

प्रस्तावना: जब दो देशों की सेनाएं, विशेषकर नौसेनाएं, अपने देश की सीमाओं से हजारों मील दूर काम करती हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है? दुश्मन नहीं, बल्कि 'रसद' (Logistics) - यानी ईंधन, खाना, पानी और मरम्मत की सुविधा। भारत अपनी सैन्य पहुंच को वैश्विक बना रहा है, और इस दिशा में 'RELOS' जैसे समझौते एक गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। आज हम समझेंगे कि यह समझौता क्या है और रूस के साथ इसकी चर्चा क्यों अहम है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों और रक्षा समाचारों में आपने अक्सर LEMOA, COMCASA या BECA जैसे भारी-भरकम शब्दों को सुना होगा। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण शब्द है RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Agreement)। यह भारत और रूस के बीच प्रस्तावित एक महत्वपूर्ण सैन्य समझौता है।

यह समझौता सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं है; यह हिंद महासागर से लेकर आर्कटिक क्षेत्र तक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि यह क्या है।

RELOS आखिर है क्या? (आसान शब्दों में)

RELOS का पूरा नाम 'रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट' है। इसे सरल हिंदी में 'पारस्परिक रसद विनिमय समझौता' कह सकते हैं।

यह एक ऐसा समझौता है जो दो देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों (Military Bases) और सुविधाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि वे वहां अपनी सेना तैनात कर सकते हैं। यह इस्तेमाल केवल 'लॉजिस्टिक्स' (रसद) तक सीमित होता है।

इसे एक उदाहरण से समझें:
मान लीजिए, भारतीय नौसेना का एक युद्धपोत उत्तरी अटलांटिक महासागर या आर्कटिक क्षेत्र में गश्त कर रहा है। उसका ईंधन खत्म होने वाला है या उसमें कोई तकनीकी खराबी आ गई है। अगर भारत और रूस के बीच RELOS समझौता है, तो वह भारतीय जहाज पास के किसी रूसी नौसैनिक अड्डे पर जाकर ईंधन भरवा सकता है, मरम्मत करवा सकता है और राशन-पानी ले सकता है। इसके लिए उसे नकद भुगतान करने की ज़रूरत नहीं होगी; इसका हिसाब दोनों देशों के बीच बाद में एक खाते (कैशलेस तरीके) से हो जाता है।

यही सुविधा रूसी जहाजों को भी मिलेगी जब वे हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में होंगे और उन्हें भारतीय बंदरगाहों की मदद की ज़रूरत होगी।

यह क्या 'नहीं' है?

यह समझना बहुत ज़रूरी है कि RELOS कोई 'सैन्य गठबंधन' (Military Alliance) या 'रक्षा संधि' (Defense Pact) नहीं है (जैसे NATO)।

  • इस समझौते के तहत, यदि भारत पर हमला होता है, तो रूस भारत की ओर से लड़ने के लिए बाध्य नहीं है (और न ही इसके विपरीत)।
  • यह केवल सुविधाओं के इस्तेमाल की अनुमति देता है, एक साथ युद्ध लड़ने की नहीं।

भारत के लिए ऐसे समझौते क्यों ज़रूरी हैं?

भारत अब केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करने वाला देश नहीं है; वह एक 'क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता' (Regional Security Provider) और एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है। इसके लिए इन समझौतों का होना अनिवार्य है:

  1. पहुँच का विस्तार (Strategic Reach): इन समझौतों से भारतीय नौसेना और वायुसेना की पहुंच दुनिया भर में बढ़ जाती है। वे अपने बेस से बहुत दूर तक और लंबे समय तक ऑपरेशन कर सकते हैं।
  2. हिंद-प्रशांत में चीन का मुकाबला: चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। उसका मुकाबला करने के लिए, भारत को दुनिया भर के मित्र देशों के ठिकानों तक पहुंच की आवश्यकता है ताकि वह हर जगह मौजूद रह सके।
  3. आपदा राहत और मानवीय सहायता: जब किसी दूर देश में प्राकृतिक आपदा आती है, तो भारतीय सेना इन समझौतों की मदद से वहां तेजी से राहत सामग्री पहुंचा सकती है।
  4. संयुक्त युद्धाभ्यास (Joint Exercises): जब दो देशों की सेनाएं एक साथ अभ्यास करती हैं, तो यह लॉजिस्टिक्स समझौता चीजों को बहुत आसान बना देता है।

भारत और रूस का RELOS: अटका हुआ मामला?

भारत ने अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे कई प्रमुख देशों के साथ इसी तरह के लॉजिस्टिक्स समझौते साइन कर रखे हैं (अमेरिका के साथ इसे LEMOA कहा जाता है)।

लेकिन, अपने सबसे पुराने रक्षा साझेदार रूस के साथ यह समझौता अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है। क्यों?

1. रणनीतिक महत्व

भारत और रूस के लिए यह समझौता दोनों के लिए फायदेमंद है। भारत को रूस के विशाल आर्कटिक क्षेत्र और सुदूर पूर्व (Vladivostok) के ठिकानों तक पहुंच मिलेगी, जो भविष्य के ऊर्जा मार्गों के लिए महत्वपूर्ण हैं। वहीं, रूस को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिंद महासागर में भारतीय बंदरगाहों तक आसान पहुंच मिलेगी।

2. भू-राजनीतिक पेंच (Geopolitical Complications)

इस समझौते के अटके होने का सबसे बड़ा कारण वर्तमान वैश्विक राजनीति है। यूक्रेन युद्ध के बाद, रूस और पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) के बीच तनाव चरम पर है।

"भारत अपनी 'सामरिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की नीति पर चलता है। वह एक ही समय में अमेरिका के साथ LEMOA और रूस के साथ RELOS रखना चाहता है। लेकिन, मौजूदा दौर में रूस के साथ किसी भी नए हाई-प्रोफाइल सैन्य समझौते पर हस्ताक्षर करने से पश्चिमी देश नाराज हो सकते हैं, और भारत इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ना नहीं चाहता।"

हालांकि, दोनों देश इस पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि निकट भविष्य में, जब भू-राजनीतिक तापमान थोड़ा कम होगा, तो इस पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

RELOS जैसे समझौते आधुनिक सैन्य कूटनीति की जीवनरेखा हैं। वे दिखावे के लिए नहीं होते, बल्कि वे सेनाओं की परिचालन क्षमता (Operational Capability) को कई गुना बढ़ा देते हैं। रूस के साथ RELOS समझौता भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' (बहु-संरेखण) विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण टेस्ट केस है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत अपनी बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षाओं और जटिल भू-राजनीतिक दबावों के बीच संतुलन कैसे बनाता है।

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