Breaking News

क्या खतरे में है डॉलर का साम्राज्य? यूक्रेन युद्ध और 'डी-डॉलरिज़ेशन' का महा-विश्लेषण (2025 रिपोर्ट)

यूक्रेन युद्ध के बाद डॉलर का 'साम्राज्य' खतरे में? वैश्विक अर्थव्यवस्था में 'डी-डॉलरिज़ेशन' की आहट (विस्तृत विश्लेषण)

यूक्रेन युद्ध के बाद डॉलर का 'साम्राज्य' खतरे में? वैश्विक अर्थव्यवस्था में 'डी-डॉलरिज़ेशन' की आहट (विस्तृत विश्लेषण)

DyGrow ग्लोबल इकोनॉमी रिपोर्ट | भू-राजनीतिक विश्लेषण | 3000+ शब्द विशेष

संपादकीय नोट: पिछले आठ दशकों से, अमेरिकी डॉलर वैश्विक वित्तीय प्रणाली का निर्विवाद राजा रहा है। दुनिया का व्यापार, देशों का खजाना (फॉरेक्स रिजर्व), और अंतरराष्ट्रीय कर्ज़—सब कुछ डॉलर के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन फरवरी 2022 में, जब रूसी टैंकों ने यूक्रेन में प्रवेश किया, तो दुनिया ने सिर्फ एक युद्ध की शुरुआत नहीं देखी, बल्कि एक ऐसी आर्थिक भूकंप की आहट भी सुनी, जिसके झटके डॉलर के सिंहासन को हिला रहे हैं। आज की यह विस्तृत रिपोर्ट 'डी-डॉलरिज़ेशन' (De-dollarization) की इसी कहानी को गहराई से समझती है। यह एक ऐसी कहानी है जो सिर्फ अर्थशास्त्रियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो यह जानना चाहता है कि भविष्य की दुनिया कैसी दिखेगी।

जब हम "डॉलर के कमजोर होने" की बात करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था रातोंरात ढह जाएगी या डॉलर का मूल्य भारतीय रुपये के मुकाबले गिर जाएगा। यह एक बहुत ही सूक्ष्म और धीमी प्रक्रिया है। इसका मतलब है वैश्विक मंच पर डॉलर के **प्रभुत्व (Dominance)** और **उपयोग (Usage)** में धीरे-धीरे कमी आना।

यूक्रेन युद्ध ने इस धीमी प्रक्रिया को एक 'फास्ट-फॉरवर्ड' मोड में डाल दिया है। दुनिया के कई देश, जो पहले डॉलर के विकल्प के बारे में सोचने से भी कतराते थे, अब खुलेआम इसके बारे में बात कर रहे हैं और कदम उठा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? और इसका हमारी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा? आइए, इस विश्लेषण के पन्नों को पलटते हैं।


भाग 1: 'किंग डॉलर' का उदय और उसका हथियार बनना (The Rise and Weaponization)

डॉलर के वर्तमान संकट को समझने के लिए, हमें यह समझना होगा कि वह 'किंग' बना कैसे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, 1944 के ब्रेटन वुड्स समझौते (Bretton Woods Agreement) ने डॉलर को दुनिया की आरक्षित मुद्रा (Reserve Currency) के रूप में स्थापित किया। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी, सबसे शक्तिशाली सेना थी, और सबसे स्थिर राजनीतिक व्यवस्था थी। दुनिया को एक भरोसेमंद मुद्रा की जरूरत थी, और डॉलर ने वह जगह भर दी।

दशकों तक यह व्यवस्था अच्छी तरह से चली। तेल का व्यापार डॉलर में होता था (पेट्रोडॉलर), देश अपनी बचत डॉलर में रखते थे, और अंतरराष्ट्रीय भुगतान डॉलर में होते थे। इसने अमेरिका को एक 'अत्यधिक विशेषाधिकार' (Exorbitant Privilege) दिया—वह अपनी मुद्रा छापकर दुनिया से सामान खरीद सकता था और अपने घाटे की भरपाई कर सकता था।

युद्ध, प्रतिबंध और 'डॉलर का हथियारीकरण'

कहानी में मोड़ तब आया जब अमेरिका ने अपनी इस वित्तीय ताकत का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति के उपकरण के रूप में करना शुरू किया। यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना।

"जब आप दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण मुद्रा को एक राजनीतिक हथियार में बदल देते हैं, तो आप दुनिया को यह संदेश देते हैं कि आपका पैसा तभी तक सुरक्षित है जब तक आप अमेरिकी नियमों का पालन करते हैं। यह विश्वास को तोड़ने वाला क्षण था।" - एक प्रमुख यूरोपीय अर्थशास्त्री

फरवरी 2022 में, अमेरिका और उसके सहयोगियों ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया। उन्होंने रूस के सेंट्रल बैंक के लगभग 300 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज (जमा) कर दिया, जो पश्चिमी बैंकों में रखा था। इसके अलावा, प्रमुख रूसी बैंकों को SWIFT (अंतरराष्ट्रीय भुगतान मैसेजिंग सिस्टम) से बाहर कर दिया गया।

इस कदम ने दुनिया भर में, खासकर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) में, खतरे की घंटी बजा दी। संदेश साफ था: "अगर कल हमारी अमेरिका से अनबन हुई, तो हमारा पैसा भी सुरक्षित नहीं है।" इसी डर ने 'डी-डॉलरिज़ेशन' की आग में घी डालने का काम किया।


भाग 2: डॉलर का कमजोर होना और उपयोग में कमी—कैसे और कहाँ?

डॉलर का उपयोग दिन-प्रतिदिन कम हो रहा है, यह सिर्फ एक धारणा नहीं है, बल्कि डेटा और ज़मीनी हकीकत इसे साबित कर रही है। यह बदलाव तीन मुख्य मोर्चों पर हो रहा है:

1. केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में गिरावट

दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपनी मुद्रा को स्थिर रखने और संकट के समय के लिए विदेशी मुद्रा भंडार रखते हैं। दशकों से, इस भंडार का बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के अनुसार, 1999 में वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 70% से अधिक थी। 2024-25 तक आते-आते, यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 58-59% के आसपास आ गई है। यह एक बड़ी गिरावट है। केंद्रीय बैंक अब विविधता ला रहे हैं—वे यूरो, जापानी येन, चीनी युआन और सबसे महत्वपूर्ण, सोने (Gold) की खरीद बढ़ा रहे हैं।

सोने की रिकॉर्ड खरीद:

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में, खासकर यूक्रेन युद्ध के बाद, केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। यह डॉलर पर से घटते भरोसे का सीधा संकेत है। देश कागजी मुद्रा के बजाय ठोस संपत्ति पर भरोसा जता रहे हैं।

2. द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उदय (Local Currency Trade)

यह सबसे तेज़ बदलाव वाला क्षेत्र है। देश अब एक-दूसरे के साथ व्यापार करने के लिए डॉलर को बिचौलिए के रूप में इस्तेमाल करने से बच रहे हैं।

  • रूस-चीन व्यापार: पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद, रूस और चीन के बीच का व्यापार लगभग पूरी तरह से डॉलर-मुक्त हो गया है। वे अब रूबल और युआन में व्यापार करते हैं। रूस के लिए युआन अब सबसे महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा बन गया है।
  • भारत के प्रयास: भारत भी रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दे रहा है। रूस के साथ तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा अब गैर-डॉलर मुद्राओं में हो रहा है (हालांकि इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं)। भारत ने यूएई और अन्य देशों के साथ भी स्थानीय मुद्रा में व्यापार के समझौते किए हैं।
  • आसियान (ASEAN) देश: दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश आपस में व्यापार के लिए स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक रूपरेखा पर काम कर रहे हैं।
  • 'पेट्रोडॉलर' का अंत?: सऊदी अरब, जो दशकों से अपना तेल केवल डॉलर में बेचता था, अब चीन जैसे ग्राहकों से अन्य मुद्राओं में भुगतान स्वीकार करने के लिए खुला है। यह एक बड़ा प्रतीकात्मक और आर्थिक बदलाव है।

3. वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का विकास (Alternative Payment Systems)

SWIFT प्रणाली पर पश्चिम के प्रभुत्व ने देशों को विकल्प तलाशने पर मजबूर किया है।

  • चीन का CIPS: चीन ने अपना खुद का 'क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम' (CIPS) विकसित किया है, जो युआन में अंतरराष्ट्रीय भुगतानों को संभालता है। इसका उपयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
  • रूस का SPFS: रूस ने भी अपना सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ फाइनेंशियल मैसेजेस (SPFS) बनाया है और इसे अन्य देशों के सिस्टम से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
  • BRICS मुद्रा की चर्चा: BRICS समूह (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य) एक साझा मुद्रा या एक एकीकृत भुगतान प्रणाली बनाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है, जो डॉलर पर निर्भरता कम करेगा।

4. आंकड़ों में गिरावट: एक नज़र (Data Analysis)

नीचे दी गई तालिका अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़ों के आधार पर वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की घटती हिस्सेदारी को दर्शाती है। यह डेटा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पिछले दो दशकों में डॉलर का प्रभुत्व कैसे कम हुआ है।

वर्ष (Year) वैश्विक रिजर्व में डॉलर का हिस्सा (%) अन्य मुद्राओं का हिस्सा (%)
1999 71.0% 29.0%
2010 62.2% 37.8%
2021 (युद्ध से पहले) 59.5% 40.5%
2024-25 (अनुमानित) ~58.5% ~41.5%

*(स्रोत: IMF COFER डेटा और विश्लेषकों के अनुमान। आंकड़े सांकेतिक हैं और इनमें बदलाव संभव है।)*

यह गिरावट धीमी लग सकती है, लेकिन वैश्विक वित्त की विशाल दुनिया में, एक प्रतिशत की गिरावट भी सैकड़ों अरबों डॉलर के बराबर होती है। यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से नीचे की ओर है।


भाग 3: यह बदलाव इतना धीमा क्यों है? डॉलर की ताकतें (The Stickiness of the Dollar)

इतनी चुनौतियों के बावजूद, यह मान लेना गलत होगा कि डॉलर का अंत निकट है। 'किंग डॉलर' अभी भी बहुत मजबूत है और उसके पास अपनी स्थिति बचाने के लिए कई ढालें हैं:

  • कोई स्पष्ट विकल्प नहीं (TINA Factor): 'देयर इज़ नो अल्टरनेटिव' (TINA)। डॉलर की जगह लेने के लिए अभी कोई एक मुद्रा पूरी तरह तैयार नहीं है।
    • यूरो (Euro): यूरोज़ोन की अपनी राजनीतिक और आर्थिक समस्याएं हैं, जो इसे एक पूर्ण विकल्प बनने से रोकती हैं।
    • चीनी युआन (Yuan): चीन की अर्थव्यवस्था बड़ी है, लेकिन उसकी मुद्रा पूरी तरह से परिवर्तनीय (convertible) नहीं है और उसकी वित्तीय प्रणाली पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है। निवेशक पूरी तरह से भरोसा नहीं कर पाते।
  • नेटवर्क प्रभाव (Network Effect): डॉलर दशकों से वैश्विक प्रणाली में गहराई से समाया हुआ है। इसे बदलना वैसा ही है जैसे दुनिया भर के कंप्यूटरों में एक नया ऑपरेटिंग सिस्टम डालना—यह बहुत जटिल और महंगा है।
  • अमेरिकी बाज़ार की गहराई: अमेरिका के पास दुनिया का सबसे गहरा, तरल (liquid) और पारदर्शी वित्तीय बाज़ार है। दुनिया भर के निवेशक, यहां तक कि चीन भी, अपने पैसे को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी बांड (US Treasury Bonds) खरीदते हैं।

भाग 4: भविष्य के परिदृश्य—एक 'बहु-मुद्रा' विश्व? (A Multipolar Currency World)

तो, हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं? क्या डॉलर खत्म हो जाएगा, या यह सिर्फ एक अस्थायी दौर है? 2025 के नज़रिए से देखें, तो भविष्य एक-ध्रुवीय (Unipolar) नहीं, बल्कि बहु-ध्रुवीय (Multipolar) मुद्रा व्यवस्था की ओर इशारा कर रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर का "अचानक पतन" होने की संभावना बहुत कम है। इसके बजाय, हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ेंगे जहां डॉलर अभी भी 'प्रथम में प्रथम' (First among equals) होगा, लेकिन उसका एकाधिकार खत्म हो जाएगा।

1. स्थानीय मुद्रा निपटान (LCS) और भारत की भूमिका

भविष्य में, हम देशों के बीच Local Currency Settlement (LCS) समझौतों में भारी वृद्धि देखेंगे। इसका मतलब है कि दो देश डॉलर को बीच में लाए बिना अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार का हिसाब-किताब करेंगे।

भारत इसमें एक प्रमुख खिलाड़ी बनकर उभर रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए विशेष वोस्ट्रो खाते (Vostro Accounts) खोलने की अनुमति दी है। रूस के अलावा, भारत श्रीलंका, बांग्लादेश और कुछ खाड़ी देशों के साथ इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, यह राह आसान नहीं है। रुपये की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता अभी कम है, और व्यापार असंतुलन (जैसे रूस के साथ) के कारण दूसरे देशों के पास बहुत सारे रुपये जमा हो जाते हैं, जिनका उपयोग करना उनके लिए मुश्किल होता है। लेकिन, यह एक शुरुआत है।

2. चीन की डिजिटल महत्वाकांक्षा और युआन

चीन अपने युआन को डॉलर का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनाने के लिए एक लंबी और रणनीतिक खेल खेल रहा है। इसमें दो प्रमुख हथियार हैं:

  • डिजिटल युआन (e-CNY): चीन दुनिया की पहली प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसने अपनी केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) लॉन्च की है। यह डिजिटल युआन भविष्य में SWIFT जैसे अमेरिकी-प्रभुत्व वाले सिस्टम को बायपास करके सीधे देशों के बीच सीमा पार भुगतान (cross-border payments) को सक्षम बना सकता है।
  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): चीन अपने विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के माध्यम से भागीदार देशों को युआन में ऋण लेने और व्यापार करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे उसकी मुद्रा का उपयोग बढ़ रहा है।

3. यूरोप का असमंजस

यूरोप एक अजीब स्थिति में है। एक तरफ, वह अमेरिका का राजनीतिक सहयोगी है और रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में शामिल है। दूसरी तरफ, उसे भी डॉलर के हथियार बनने से डर लगता है क्योंकि इससे उसकी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) खतरे में पड़ती है। यूरोपीय संघ कोशिश कर रहा है कि यूरो का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बढ़े, ताकि वह डॉलर और युआन के बीच न फंसे।


निष्कर्ष: एक युग का अंत, एक नए का आरंभ

यूक्रेन युद्ध ने उस प्रक्रिया को उत्प्रेरित किया है जो पहले से ही धीमी गति से चल रही थी। डॉलर का हथियारीकरण एक ऐसा कदम था जिससे पीछे लौटना मुश्किल है। दुनिया ने देख लिया है कि एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता एक रणनीतिक जोखिम है।

हम एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर हैं जहां 1944 में बनी वित्तीय व्यवस्था चरमरा रही है। यह रातोंरात नहीं बदलेगी, लेकिन दिशा स्पष्ट है। भविष्य की दुनिया केवल एक "किंग डॉलर" द्वारा शासित नहीं होगी, बल्कि यह मुद्राओं का एक "लोकतंत्र" होगा, जहाँ डॉलर, यूरो, युआन और शायद सोने और डिजिटल मुद्राओं का एक मिला-जुला शासन होगा।

यह बदलाव वैश्विक शक्ति संतुलन में पश्चिम से पूर्व और ग्लोबल साउथ की ओर हो रहे बदलाव का ही एक आर्थिक प्रतिबिंब है। यह एक अधिक जटिल, अधिक खंडित, लेकिन शायद एक अधिक संतुलित दुनिया की शुरुआत है।

लेखक के बारे में: रजनीश कुमार एक वरिष्ठ आर्थिक और भू-राजनीतिक विश्लेषक हैं। वे वैश्विक वित्तीय प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पिछले डेढ़ दशक से गहन शोध और लेखन कर रहे हैं। वे DyGrow के लिए जटिल वैश्विक मुद्दों का सरल और मानवीय विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

No comments